�� रूहानी प्रेम योग ��

बृहस्पति-चंद्र करुणा योग | त्यागशक्ति योग

जब कुंडली का द्वादश भाव प्रेम के ग्रहों चंद्र, शुक्र और बृहस्पति के साथ शुभ संयोग में होता है, और नवांश में बृहस्पति-चंद्र की दृष्टि बनती है, तब जन्म लेती है वह स्त्री

जो इश्क़ को कैद नहीं, एक तप मानती है।
जिसके लिए प्रेम कोई अधिकार नहीं एक पूजा है
वह अपने महबूब की मुस्कान के लिए अपने वजूद तक को कुर्बान कर देती है।

वह प्रेम में नहीं जलती वह प्रेम में खुद को जला देती है।
और उसी राख से उगता है वह भाव जो हर जनम में मुकम्मल नहीं होता

"ऐसी रूहें अक्सर मिलती नहीं,
मिलें तो उन्हें मोहब्बत नहीं,
सजदा समझो…"

यह योग बृहज्जातक, पाराशर होरा व भगवद्गीता में भी वर्णित है जहाँ स्त्री का त्यागमयी प्रेम शक्ति बनकर उभरता है।

*बृहज्जातक (वराहमिहिर):* "चंद्र-बृहस्पति की युति स्त्री के भीतर सौंदर्य, दया, धर्मनिष्ठा और प्रेम का जन्म देती है। यदि यह द्वादश स्थान से जुड़ी हो, तो वह स्त्री त्यागमयी और आध्यात्मिक स्वभाव की होती है।"

*बृहत्पाराशर होरा शास्त्र:* "गुरु यदि चंद्र के साथ या दृष्टि में हो, और भाव शुभ हो, तो जातक धर्मनिष्ठ, संयमी, त्यागी और परम स्नेही होता है।" यह योग दर्शाता है कि बृहस्पति-चंद्र की दृष्टि किसी जातक विशेषकर स्त्री को भावनात्मक रूप से गहराई देने वाली बनाती है। वह प्रेम में आत्मा से जुड़ती है, देह से नहीं।

*देवी भागवत पुराण (स्कंध ७):* "स्त्री का स्वभाव करुणा, ममता, सेवा और समर्पण है। यदि उसमें त्याग की भावना हो, तो वह साक्षात शक्ति का रूप होती है।" यह संकेत करता है कि यदि कुंडली में त्याग योग प्रबल हो, तो वह स्त्री अपने प्रेम को एक देवी-तुल्य तपस्या के रूप में निभाती है।

*भगवद्गीता (अध्याय १२, श्लोक १३-१४):* "अद्वेष्टा सर्वभूतानां, मैत्रः करुण एव च... यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥" जो सभी से प्रेम और करुणा रखता है, मैत्रीभाव से युक्त है वह भक्त मुझे प्रिय है।)

जब द्वादश भाव (मोक्ष  त्याग) प्रेम ग्रहों (शुक्र, चंद्र, गुरु) के साथ शुभ सम्मिलन में आए, जब चंद्रमा और गुरु शुभ भावों में मधुर राग छेड़ें, और द्वादश भाव त्याग की लौ से जलता हो, तब जनमती है वह रूहानी इश्क वाली स्त्री।

 

नवांश में बृहस्पति-चंद्र की दृष्टि जब इश्क को इबादत बना दे, तब वह स्त्री अपनी रूह तक को कुर्बान कर देती है महबूब की मुस्कान के लिए। उसके लिए इश्क कैद नहीं, एक तप है एक सजदा है, जो हर जनम में मुकम्मल नहीं होता, जिसमें खुद को मिटाकर भी वो किसी और के सुकून में मुस्कराना जानती है।

"रूहानी प्रेम योग" केवल ज्योतिषीय संयोग नहीं यह एक आत्मिक स्त्री के जन्म की भविष्यवाणी है।  वह स्त्री, जिसकी आत्मा करुणा की पगडंडी पर चलकर, प्रेम को ईश्वर की उपासना बना देती है। वह प्रेम में वासना नहीं, विरक्ति खोजती है। वह मिलन की भूखी नहीं प्रियतम की मुस्कान के लिए अपने वजूद तक को अर्पित करने वाली होती है।

ऐसी रूहें अक्सर मिलती नहीं; मिलें तो उन्हें मोहब्बत नहीं, सजदा समझो…”यह योग न केवल शास्त्रों की दृष्टि में सत्य है, बल्कि उस दिव्य प्रेम की अनुभूति भी है जो हर जन्म में संभव नहीं होता।

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