"एकतरफ़ा प्रेम योग" (Unrequited Love Yoga): ग्रहों की मौन चाल और रूह की पुकार… अगर पंचम भाव चंद्र-राहु से पिघल रहा हो और शुक्र द्वादश में मौन बैठा हो,पंचम भाव पर शनि, राहु या केतु की छाया पड़े तब प्रेम गहराई से जन्म लेता है,मोहब्बत तो परवान चढ़ती है… पर मंज़िल उससे रूठी ही रहती है। दिल तो बेइंतहा चाहता है… पर मुक़द्दर हर बार खामोश रह जाता है। गुरु की दृष्टिहीनता जब सप्तम या पंचम पर मंडराती है, तो प्रेम अधूरा ही रह जाता है, ना मिलन, ना मोक्ष... बस इंतज़ार। और जब केतु पंचम में डेरा डाल दे तो समझो ये इश्क़ इस जन्म का नहीं, किसी पिछले जनम का अधूरा सिला जो मुकम्मल कभी नहीं होता, बस हर जनम में किसी इंतज़ार की तरह ज़िंदा रहता है। "एकतरफ़ा प्रेम योग" केवल एक ज्योतिषीय स्थिति नहीं, बल्कि एक आत्मिक अनुभव है, जिसकी जड़ें वैदिक ग्रंथों और भक्ति साहित्य में गहराई से समाई हुई हैं। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में पंचम भाव पर पाप ग्रहों की दृष्टि, शुक्र का द्वादश में स्थित होना, तथा गुरु की दृष्टिहीनता जैसे योगों को प्रेम में विघ्न और अधूरे परिणाम का कारण बताया गया है। भागवत पुराण...
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